भारत में चुनावों को ‘लोकतंत्र का त्योहार’ कहा जाता है। लेकिन अगर हम रैलियों की भीड़, कटआउट्स और सोशल मीडिया कैम्पेन के शोर से थोड़ा पीछे हटकर देखें, तो एक कड़वी सच्चाई नजर आती है—इलेक्शन अब सिर्फ एक पॉलिटिकल प्रोसेस नहीं रहा, यह एक प्रॉपर बिजनेस (Business) बन चुका है। Centre for Media Studies (CMS) की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2019 के लोकसभा चुनावों में लगभग ₹55,000 से ₹60,000 करोड़ खर्च हुए थे। दुनिया के सबसे महंगे चुनावों में से एक!
लेकिन यह पैसा आ कहाँ से रहा है? और उससे भी बड़ा सवाल—जो लोग या कॉर्पोरेट्स यह पैसा इन्वेस्ट कर रहे हैं, वो रिटर्न में क्या मांगते हैं? यह एक ऐसा मुद्दा है जिस पर बात करना हर वोटर के लिए जरूरी है, क्योंकि यह सीधा आपके टैक्स के पैसे और आपके हकों से जुड़ा है।
यह समस्या आम आदमी के लिए क्यों मायने रखती है?

अगर आपको लगता है कि चुनावी फंडिंग सिर्फ राजनेताओं और बड़े उद्योगपतियों का मामला है, तो आप गलत हैं। सोचिए, चुनाव आयोग (ECI) की लिमिट के बावजूद, अगर एक उम्मीदवार चुनाव जीतने के लिए ₹10 करोड़ से ₹30 करोड़ तक खर्च करता है (जो कि ग्राउंड रियलिटी है), तो जीतने के बाद उसका पहला टारगेट क्या होगा?
जाहिर है—Return on Investment (ROI)। यह पैसा रिकवर कहाँ से होगा? यह आपके शहर की सड़कों के ठेके से, सरकारी टेंडर्स में होने वाले कमीशन से, और इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की क्वालिटी से कॉम्प्रोमाइज करके निकाला जाता है। यानी, महंगे चुनाव सीधे तौर पर करप्शन (corruption) को जन्म देते हैं, जिससे आम नागरिक को खराब शिक्षा, लचर स्वास्थ्य सुविधाएँ और टूटी सड़कें मिलती हैं।
समस्या की जड़ क्या है? (The Root of the Problem)
भारत के चुनाव सिस्टम में सबसे बड़ा लूपहोल यह है कि कानून कैंडिडेट के खर्च पर लिमिट लगाता है, लेकिन राजनीतिक दल (Political Party) के खर्च पर कोई लिमिट नहीं है।
- ब्लैक मनी का खेल: चुनाव जीतने के लिए ‘विनेबिलिटी’ (winnability) सबसे बड़ा फैक्टर बन गया है। पार्टियां उसी को टिकट देती हैं जिसके पास पैसा और मसल पावर (muscle power) है।
- हिडन फंडिंग: जब तक सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्टोरल बॉन्ड्स (Electoral Bonds) को असंवैधानिक (unconstitutional) घोषित नहीं किया था, तब तक यह सिस्टम पूरी तरह से अपारदर्शी (opaque) था। वोटर को पता ही नहीं था कि किस कॉर्पोरेट ने किस पार्टी को कितना चंदा दिया है।
कॉर्पोरेट प्रभाव और Policy Capture
पॉलिटिक्स और कॉर्पोरेट सेक्टर का नेक्सस (nexus) कोई नई बात नहीं है, लेकिन अब यह बहुत ज्यादा ऑर्गेनाइज्ड हो गया है। इसे ‘क्रॉनी कैपिटलिज्म’ (Crony Capitalism) कहते हैं। जब बड़े कॉर्पोरेट घराने चुनाव में भारी फंडिंग करते हैं, तो वे चैरिटी नहीं कर रहे होते हैं। वे दरअसल नीतियां (policies) खरीद रहे होते हैं।
जब सरकार सत्ता में आती है, तो वह ऐसे नियम बनाती है या ऐसे कॉन्ट्रैक्ट्स पास करती है जिससे उन डोनर्स को सीधा फायदा हो। इसे ‘पॉलिसी कैप्चर’ (Policy Capture) कहा जाता है। इसमें नुकसान किसका होता है? छोटे व्यापारियों का, फेयर मार्केट कॉम्पिटिशन का और अंततः आम कंज्यूमर का।
संस्थागत और नियामक विफलताएँ (Institutional Failures)
सिस्टम को साफ रखने की जिम्मेदारी चुनाव आयोग (ECI), इनकम टैक्स डिपार्टमेंट और अन्य जांच एजेंसियों की है। लेकिन यहाँ कुछ बड़ी स्ट्रक्चरल कमियां हैं:
- ECI के पास लिमिटेड पावर: चुनाव आयोग के पास उम्मीदवारों को अयोग्य ठहराने के सीमित अधिकार हैं।
- कैश ट्रांजैक्शन: आज भी पॉलिटिकल पार्टियों को मिलने वाले चंदे का एक बड़ा हिस्सा कैश में आता है, जिसे ट्रेस करना लगभग नामुमकिन होता है।
- एजेंसियों का राजनीतिकरण: अक्सर जांच एजेंसियों का इस्तेमाल करप्शन रोकने से ज्यादा, पॉलिटिकल सेटलमेंट और विपक्षी फंड्स को फ्रीज करने के लिए किया जाता है, जो लेवल प्लेइंग फील्ड (level playing field) को खत्म कर देता है।
विशेषज्ञ और डेटा क्या कहते हैं?
Association for Democratic Reforms (ADR) सालों से इस मुद्दे पर काम कर रहा है। ADR की रिपोर्ट्स स्पष्ट रूप से दिखाती हैं कि कैसे संसद और विधानसभाओं में करोड़पतियों (crorepati MPs) की संख्या लगातार बढ़ रही है।
- डेटा बताता है कि चुनाव लड़ने के लिए अगर आपके पास करोड़ों रुपये नहीं हैं, तो आपके जीतने के चांस 1% से भी कम रह जाते हैं।
- सुप्रीम कोर्ट ने भी हाल ही में इलेक्टोरल बॉन्ड मामले में कहा था कि “पैसा और राजनीति का गठजोड़ लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करता है,” क्योंकि यह मतदाता के ‘जानने के अधिकार’ (Right to Information) का उल्लंघन करता है।
संभावित समाधान और सुधार (The Way Forward)
इस सिस्टम को ओवरहॉल (overhaul) करने के लिए कुछ कड़े कदमों की जरूरत है:
- स्टेट फंडिंग ऑफ इलेक्शंस (State Funding): कई पूर्व कमेटियों (जैसे इंद्रजीत गुप्ता कमिटी) ने सुझाव दिया है कि चुनाव का खर्च सरकार उठाए। हालांकि कैशलेस इकोनॉमी में यह कितना प्रैक्टिकल है, इस पर बहस जारी है।
- पूर्ण ट्रांसपेरेंसी (Total Transparency): हर एक रुपये का चंदा, चाहे वह ₹100 का हो या ₹10 करोड़ का, डिजिटल होना चाहिए और RTI के दायरे में आना चाहिए।
- पार्टी खर्च पर लिमिट: कैंडिडेट्स की तरह ही पॉलिटिकल पार्टियों के चुनाव खर्च पर भी एक सख्त लिमिट (Cap) तय होनी चाहिए।
- इनर-पार्टी डेमोक्रेसी: पार्टियों के भीतर चुनाव हों, ताकि टिकट पैसे वालों के बजाय जमीन से जुड़े कार्यकर्ताओं को मिले।
निष्कर्ष (Conclusion)
कैंपेन फंडिंग का यह पूरा इकोसिस्टम यह साबित करता है कि लोकतंत्र में ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ (One Person, One Vote) का सिद्धांत तो है, लेकिन पॉलिसी मेकिंग में ‘एक रुपया, एक वोट’ (One Rupee, One Vote) का सिस्टम हावी हो चुका है।
मुख्य सीख: जब तक चुनावों को एक ‘इन्वेस्टमेंट मॉडल’ की तरह देखा जाएगा, तब तक सरकारें पब्लिक के लिए कम और अपने इन्वेस्टर्स (डोनर्स) के लिए ज्यादा काम करेंगी। भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि कैसे हम राजनीति को पैसे के चंगुल से आज़ाद करें, ताकि नीतियां आम जनता के हित में बनें।
क्या हम सच में अपने नेताओं को चुन रहे हैं, या हम सिर्फ उन चेहरों पर मुहर लगा रहे हैं जिन्हें किसी और ने स्पॉन्सर (sponsor) किया है? अगली बार वोट डालने से पहले यह सवाल खुद से जरूर पूछें।










