देश का हर व्यक्ति चाहता है कि हर ऑफिसर ईमानदार हो जाए, लेकिन जब कोई ऑफिसर नियमों के मुताबिक काम करने लगता है तब उसे ठीक से काम नहीं करने दिया जाता।
सबसे पहले उस पर दबाव बनाना शुरू हो जाता है। कई बार बड़ी पॉलीटिकल पार्टी की रोक-टोक, कई बार लोकल राजनीति और कई बार तो हमारा करप्ट सिस्टम उस ईमानदार ऑफिसर को घेर लेता है। अंत में या तो ईमानदार ऑफिसर खुद समझौता कर लेता है या फिर सिस्टम उसे अकेले लड़ने के लिए छोड़ देता है।
ईमानदार अधिकारियों का अचानक ट्रांसफर उन्हें विवादों में फंसाना, समय से पहले रिटायरमेंट लेने के लिए मजबूर करना यह सब कुछ हमारे सिस्टम के कमजोरी को साफ तौर से दिखाता है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्यों हमारे सिस्टम में इतनी कमियां है जो एक ईमानदार व्यक्ति यहां टिक नहीं सकता?
क्या सच में सिस्टम को ईमानदार अफसर से डर लगता है?

करप्शन को सबसे ज्यादा ताकत मिलती है मौन और समझौते से, जब कोई ईमानदार ऑफिसर अपनी ईमानदारी के साथ काम करता है, फाइलों और नियमों को देखता है। वह सिफारिश से नहीं पिघलता, पैसों के आगे नहीं झुकता इसका साफ अर्थ है कि वह न मौन रहता है, ना समझौता करता है।
अब ऐसे ऑफिसर की वजह से कई लोगों का निजी फायदा प्रभावित होता है। हालांकि एक अकेला ईमानदार व्यक्ति पूरे नेटवर्क के सामने लंबे समय तक खड़ा नहीं रह सकता। क्योंकि हमारा पूरा का पूरा सिस्टम ही भ्रष्ट है और इस भ्रष्ट सिस्टम के पीछे है एक बहुत बड़ा नेटवर्क। इसीलिए शायद जब कोई ईमानदार व्यक्ति व्यवस्था के साथ जुड़ता है और ईमानदारी से काम करता है तब पूरा का पूरा करप्ट नेटवर्क डरने लगता है।
सिस्टम और कुछ नहीं बल्कि देश के हर नागरिक से मिलकर बना है। परंतु देश का हर नागरिक आज अपना काम जल्दी करवाने के चक्कर में रिश्वत देने का आदी हो चुका है। नियमों का पालन न करना, सही का साथ ना देना, अपने नुकसान से बचने के लिए गलत सहते रहना, यह सब कुछ एक ईमानदार अवसर को काम करने से रोकता है।
यही वजह है कि जब एक ईमानदार अफसर पूरी निष्ठा और ईमानदारी से अपना काम करता है तब गलत करने वाले लोग मिलकर उस ईमानदार अफसर के हाथ बांध देते हैं। क्योंकि यहां सबसे बड़ा नुकसान लोगों का ही होता है और इन लोगों से ही सिस्टम बनता है।
ईमानदार अफसर को किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है?
कई बार ईमानदार अफसर को बेहद कम समय में अलग-अलग विभागों या अलग-अलग डिस्ट्रिक्ट में ट्रांसफर कर दिया जाता है। इसकी वजह से इन अफ़सरों के द्वारा बनाई गई योजनाएं सही समय पर पूरी नहीं होती। ईमानदार अफसर को ऊपर से आए आदेश का भी पालन करना पड़ता है। ऐसे में वह अपने नियम पर टिके नहीं रह पाते।
अगर कोई अफ़सर लगातार सिस्टम के खिलाफ जा रहा है तो उससे बड़े अधिकारी उसके खिलाफ कार्यवाही करने लगते हैं झूठे केस में फंसाना, कानूनी विवाद खड़े करना। इसके अलावा एक ईमानदार ऑफिसर को न केवल प्रोफेशनल फ्रंट पर लेकिन पर्सनल फ्रंट पर भी काफी कुछ झेलना पड़ सकता है। क्योंकि सिस्टम ईमानदार ऑफिसर के साथ-साथ उसके परिवार को भी अपना दुश्मन मानने लगता है।
कुछ वास्तविक उदाहरण जिन्होंने सिस्टम से पंगा लिया
हरियाणा कैडर के IAS अधिकारी ‘अशोक खेमका’ इनको अपने प्रोफेशनल करियर के दौरान कई बार ट्रांसफर का सामना करना पड़ा। इन पर लगातार दबाव बनाया गया और उन्हें कई विवादों में भी फंसाया गया।
दुर्गा शक्ति नागपाल इन्होंने उत्तर प्रदेश में अवैध खनन के खिलाफ कार्यवाही की थी और इसके बाद उन्हें कई बार प्रशासन की झूठी कार्यवाही का सामना करना पड़ा। साथ ही उन्हें काम से भी निकाला गया।
टी.एन. शेषन जो चुनाव आयोग को पूरी तरह से बदलने के लिए जाने जाते हैं। उनके खिलाफ भी कई सारी झूठी कार्यवाही की गई। उन्होंने चुनावी आचार संहिता को देश मे सख्ती से लागू करने पर जोर दिया जिसकी वजह से कई राजनीतिक पार्टी इनके खिलाफ भी हो गई।
ई.श्रीधरन जिन्हें मेट्रो मैन के नाम से जाना जाता है यह भी काफी ईमानदार और ट्रांसपेरेंट रूप से काम करना पसंद करते थे। लेकिन उनकी कई सारी योजनाओं से सरकार खुश नहीं थी और इन्हें भी कई सारी राजनीतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा।
ईमानदार अधिकारी किसी फिल्म के सुपर हीरो नहीं होते की फ़िल्म खत्म तो अंत मे विजय उन्ही की होगी। असल में वे भी इस व्यवस्था का हिस्सा होते हैं जिस व्यवस्था का हिस्सा देश का हर आम नागरिक है। इस व्यवस्था में दबाव, राजनीति और व्यक्तिगत जिम्मेदारियां सब कुछ मिला हुआ होता है।
ईमानदार अधिकारी के हिस्से में तालियां नहीं बल्कि तबादले, सम्मान नहीं बल्कि दबाव, समर्थन नहीं बल्कि अकेलापन ही आता है। इसीलिए शायद हमारा सिस्टम भ्रष्ट को गलत नहीं बल्कि ईमानदार को अपना खतरा मानने लगा है। यही वजह है कि ईमानदार ऑफिसर हमारे सिस्टम में सर्वाइव नही कर पाते और कर भी गए तो उन्हें काफी कुछ झेलना पड़ता है।
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